Wednesday, 9 September 2020

चलो फिर से अंजान हो जाते हैं।।

चलो-
फिर से अंजान हो जाते हैं।

इस भागती हुई जिंदगी में कहीं खो जाते हैं, 
और अचानक फिर कहीं मिल जाते हैं,

क्या पता-
उस आवाज का, उन नशीली आंखो का जादू फिर चल जाए,

क्या पता-
वो मोहब्बत, वो पागलपन फिर जग जाए, 
वो खामोश रातें, फिर बोलने लगें, 

पहली नजर का- वो पहला इश्क,

शायद- 
फिर से हो जाए,

चलो!

चलो न-
फिर से अंजान हो जाते हैं।

Friday, 19 June 2020

Uniform

When I was eighteen, a disoriented teen inspired by a TV serial fascinated by the uniform I decided to join the league of men in uniform. I was not influenced by the pay package and believe me I was not even aware of my perks and privileges, infact my dad told me that I may not own a car of my own .  But even then I went ahead. 

Don't know why?  Anyways,  the time flew by in wink of an eye. I donned those uniforms which I had seen in the TV serial, told my buddy to click a photo and felt on top of the world. I remain  away from my family for long, haven't seen my grandmother for more than a year now. Remain awake for nights cause the nature of my duty, doesn't allow me to do so. Sometimes I don't call my mother for months cos the place where I am, doesn't have a network station. 
BIG DEAL... 
Seriously Big Deal. 

I do all this because some years back I chose it for myself (and even for a second I don't regret my decision). So why all of a sudden you should start respecting me?  You never told me to go through all this. So why now I expect you to honour me in the name of serving the country. 

You are equally doing the same may be more than me. You are a scientist, engineer, doctor, politician, teachers. You are the building block of the nation. You are heading the wagon of prosperity. I am mere a guard... May be a Royal Guard.... who has promised to protect you. I feel offended when I see these messages floating in social sites like soldiers not getting respect in the country... Media not covering a soldiers burial... Politicians not attending soldiers cremation... Let me assure you we don't need all this and I will tell you why... 

Everytime I walk in my uniform my mother feels proud and my brother and sister pretends to salute me...  My father thinks I am the best son and my dear feiends often ask me to get a photograph clicked with them... I have earned my respect.

Media should pay attention on dangling economy... A soldier wrapped in tricolour needs no cameras to prove his importance... He has proved his worth.... 

And it was good that his last journey was not polluted by a corrupt politician... He will rest in peace... 

So brother 
Media or no media 
Respect or  no respect 
Perks or no Perks 
I assure you we will continue to guard you till there is blood in veins and spirit in body... 

Cause I live by chance..love by choice and kill by profession....

Friday, 29 May 2020

Drama or Debates

#Shame_RepublicTV.
If this we call a NewsChannel then we better stop watching news anymore.

My humble request to all the Digital Media regulators to not allow these #Cartoons_on_National_Channels.

They will present u vague facts, unknown documents, half baked stories, irrelevant data and then they will shout loud and ask us all to judge them.

I am sure you watch these #Debates_or_Drama,   for half an hour and your blood pressure will shoot up and every part of your body will be bleeding due to anger, irritation, annoyance or something else.

Unfortunately, this is what the news channels wants, to enhance and  encash their TRPs.

It is easier to influence and convince people through emotions rather than factual evidence.

 Save #Indian_Journalism, which is  going through a phase that I wish I hadn’t witnessed in my lifetime.

I request you all 
#Dont_get_trapped.

Sunday, 17 May 2020

ये देश इनका भी उतना है जितना तेरा और मेरा है।।


ये देश इनका भी उतना है
जितना तेरा है और मेरा है,
फिर अपने ही घर जाने की आस में
क्यूँ ये घबराया सा गरीब मजदूर श्रमिकों का रेला है?

शर्म आती है अपने ऊपर
'विकसित' समाज और सरकारों पर,
ये तेरा राज्य ये मेरा राज्य के नाम पर
क्यूँ पशुओं की तरह हमने इन्हें इधर उधर ठेला है?

क्यूँ आखिर क्यूँ?

ये देख इनका भी उतना है जितना तेरा और मेरा है।।

Saturday, 16 May 2020

ख़ाक जिंदा है हम



 मज़लूम की मौत-
मौत न रहकर-
बस नंबर भर रह जाए,

जब दूर कोई नेता- 
अपनी आरामगाह से-
निर्लज्ज आँकड़ों में उलझाकर-
अपनी जीत बघाये।

जब ज़िम्मेदार-
बदहाली पर-
मासूमियत दिखाए,

जब भूख से-बेकारी से-
घर जाने की लाचारी से,

सडक पर-
कोई बेवजह जान गवाए,

तब यकीन मानों-
मरा वो नहीं- मरे हैं हम।

मरे हैं हम,
बिन आत्मा के जिंदा है हम।।

Thursday, 14 May 2020

प्रकृति ने पृथ्वी को मौका दिया है।

सुधरने का सुधारने का,
आदतों को बदलने का,
थोड़ा सोचने, थोड़ा समझने का,
आत्मचिंतन का मौका दिया है,
प्रकृति ने पृथ्वी को एक मौका दिया है।

टूटे रिश्तों को जोड़ने का,
पश्चिमी आचरण को छोड़ने का,
स्वदेश को, स्वदेशी को अपनाने का,
स्वयं को, देश को आत्मनिर्भर बनाने का मौका दिया है,
प्रकृति ने पृथ्वी को एक मौका दिया है।

दूर भागती जिंदगी को ठहरने का,
कुछ फुरसत के पल बिताने का,
कॉफी से चाय पर आने का,
हाथ जोड़, नमस्ते दोहराने का,
प्रकृति ने फिर इंसा को एक मौका दिया है।

तुलसी का मूल्य समझने का,
वेदों को, योग को अपनाने का,
स्वर्णिम भारतीय इतिहास को  पुनर्जीवित करने का,
फिर से खुद को पहचानकर, घर को लौटने का मौका दिया है,
प्रकृति ने संभलने का एक मौका दिया है। 

इंसानों को घरों में कैद कर,
जंगल में जानवरों को रिहा किया है,
नदियों को, नहरों को फिर से जीने का,
परमाणु के युग में कीटाणु कि अहमियत समझने का अवसर दिया है

प्रकृति ने पृथ्वी को एक मौका दिया है।।

शुभम गुप्ता
सहायक कमांडेंट
31 वाहिनी,
(केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल)

Friday, 28 February 2020

मै देश का गुरूर हूं, मै खाकी हूं

मै देश का गुरूर हूं,

दिन हूँ, रात हूँ,
सांझ वाली बाती हूं,
मैं खाकी हूँ।
आंधी में, तूफ़ान में,
होली में, रमजान में,
देश के सम्मान में,
अडिग कर्तव्यों की,
अविचल परिपाटी हूँ,
मैं खाकी हूँ।
तैयार हूँ मैं हमेशा ही,
तेज धूप और बारिश,
हँस के सह जाने को,
सारे त्योहार सड़कों पे,
‘भीड़’ के साथ ‘मनाने’ को,
पत्थर और गोली भी खाने को,
मैं बनी एक दूजी माटी हूँ,
मैं खाकी हूँ।
विघ्न विकट सब सह कर भी,
सुशोभित सज्जित भाती हूँ,
मुस्काती हूँ, इठलाती हूँ,
वर्दी का गौरव पाती हूँ,
मैं खाकी हूँ।
तम में प्रकाश हूँ,
कठिन वक़्त की आस हूँ,
हर वक़्त तुम्हारे पास हूँ,
बुलाओ, मैं दौड़ी आती हूँ,
मैं खाकी हूँ।
भूख और थकान
की बात ही क्या,
कभी आहत हूँ,
कभी चोटिल हूँ,
और कभी तिरंगे में लिपटी,
रोती सिसकती छाती हूँ,
मैं खाकी हूँ।
शब्द कह पाया कुछ ही,
आत्मकथा मैं बाकी हूँ,
मैं खाकी हूँ।


Tuesday, 11 February 2020

बेच दिया ज़मीर केवल बिजली पानी पर।।

भारत माता सिसक रही हैं,तुम सब की नादानी पर,
ज़मीर तुमने बेच दिया, केवल बिजली व पानी पर ।।

तुम बोले मंदिर बनवाओ, 'उसने' काँटा साफ किया,
और तीन सौ सत्तर धारा वाला स्विच ही ऑफ किया,
इच्छा यही तुम्हारी थी,घुसपैठी भागें भारत से,
लाकर के कानून हौंसला घुसपैठी का हाफ किया।

राणा-वीर शिवा के वंशज,रीझे कुटिल कहानी पर।
तुम जमीर को बेच दिए,केवल बिजली व पानी पर ।।1।।

रेप किए, छाती काटा, माँ-बहनों सँग हैवानी की,
याद न आया चार लाख हिंदू के करुण कहानी की,
न्याय दिलाना चाहा 'वो' तो तुमने ये अंजाम दिया?
थूकेगा इतिहास, करेगा मंथन  कारस्तानी की ।

अपनों से ज्यादा विश्वास किए तुम पाकिस्तानी पर।
तुम जमीर को बेंच दिए,केवल बिजली व पानी पर ।।2।।

'उनके' बच्चे-बच्चे समझें,किसको वोट नहीं देना,
टुकड़े-टुकड़े करें देश का,फिर भी खोट नहीं देना,
'तीन तलाक' महामारी, आजाद किया खातूनों को,
लेकिन धरने पर बैठी हैं,पति को चोट नहीं देना।

कैसे कोई करे भरोसा,अपने हिंदुस्तानी पर।
तुम जमीर को बेंच दिए,केवल बिजली व पानी पर।।3।।

क्या कसूर था 'सीएए' पर, 'वो' अड़ गया बताओ तो?
क्या कसूर था पाकिस्तानी पर चढ़ गया बताओ तो?
तुमने जो-जो मांग किया, सब पर कानून बनाया 'वो'
यदि 'एनारसी' पर थोड़ा आगे बढ़ गया बताओ तो?

गांधी-नानक की धरती पर, वोट किए हैवानी पर,
तुम जमीर को बेंच दिए,केवल बिजली व पानी पर ।।4।।

सीट तीन सौ तीन मिली थी,फिर क्यों रिस्क उठाया 'वो'?
भ्रष्टाचारी एक हुए सब,फिर भी क्या घबराया 'वो' ?
तुम पर 'उसे' भरोसा था,इस खातिर कदम बढ़ाया 'वो',
'तुम रोहिंग्या के साथी हो', इतना समझ न पाया 'वो'!

देखो 'वे' सब एक हो गईं,पत्तल भर बिरियानी पर।
तुम जमीर को बेंच दिए,केवल बिजली व पानी पर ।।5।।

पन्नादाई अगर सुनीं तो तुम सबको दुत्कारेंगी,
लक्ष्मीबाई वहाँ स्वर्ग से थूकेंगी,फटकारेंगी,
जीजाबाई रोंएंगी,बिलखेंगी,तुम्हें निहारेंगी,
बस यात्रा क्या मिली मुफ्त, द्रोही को आप सँवारेंगी?

दिल्ली की महिलाएं रीझीं,अफजल और गिलानी पर।
तुम जमीर को बेंच दिए,केवल बिजली व पानी पर ।।6।।

जीत नहीं ये झाड़ू की है, तालीबानी जीत गए,
शाहिनबाग नहीं जीता है,अफजल -बानी जीत गए,
जेएनयू जीता है अबकी,रोहिंग्या भी जीत गए,
सच्चे हिंदुस्तानी हारे, पाकिस्तानी जीत गए।

एक वोट भी दे नहिं पाए,शहीदों की कुर्बानी पर।
तुम जमीर को बेंच दिए, केवल बिजली व पानी पर ।।7।।

Wednesday, 15 January 2020

थोड़े बादल, थोड़ी शराब आए।।


परेशानियों से कह दो कुछ ठहर के आए,

पहले थोड़े बादल, थोड़ी शराब आए।।

छिप जाने दो आफ़ताब को हिम के आंचल में,

पर कह देना कि कल फिर दुरुस्त आए।।

बिखर जाने दो रंगीन पानी को, 

इससे पहले कि महताब आए।।

मंजिल ए मुकां का तो पता नहीं,

रास्ते बड़े बरखुरदार आए।। 

ज़हर को पहुंचने दो दिलों दिमाग तक, 

फिर क्या आंधी, क्या तूफान आए।।

लड़ना तो  था जमाने से अकेले ही, 

खुदा बनकर तेरे वर्गे यार आए।।

ढूंढ रहा था पता हसीं का अपनी,

चलते ही तोहफे गमों के हज़ार आए।।