Monday, 13 September 2021

एक विनम्र आग्रह

प्यारे दोस्तों ...
 एक विन्रम आग्रह  उन सभी के लिहे जो उत्सुक है युद्ध को, आप सभी के हौसलों एवं दृढ़ता को एक फौजी का सलाम।।

मैं हु, मेरी राइफल है,मेरी तन्हाई है...
आप भी यहां होते तो अच्छा होता।।

सर्दी की फिक्र मत कीजियेगा,
बर्फ की चादर है मेरे पास,
राइफल के तकिये ओर स्लीपिंग बैग का मजा ही कुछ और है, 
आप भी अपनी मखमली रजाई ओर पश्मीना कम्बल छोड़कर यहां आजाते तो अच्छा होता।।

वो नहर किनारे वाला मीठा पानी पिये हुए काफी दिन हो गए, थोड़ा पानी ले आते तो अच्छा होता।।

माफ् कीजियेगा, 
डोसा बर्गर या पिज़्ज़ा तो नही खिला पाऊंगा, पर पाउडर दूध वाला दलिया ओर मैग्गी बहोत है, साथ बैठकर खाते तो अच्छा होता।

मेरे जवान छुट्टी जाने को बोल रहे है,
मैने कह दिया है कि मेरे भाई और दोस्त दिल्ली और मुम्बई से छुट्टी लेकर आते ही होंगे, 
आप अगर जल्दी आ जाते तो अच्छा होता।।

टी.वी. पर डिबेट्स देखकर जो रणनिति बना रखी है आपने,
वो सही में काबिल ए तारीफ होगी,
यहां सरहद पर साथ बैठकर चर्चा करते तो अच्छा होता।।

घर बोलकर आना की लंबी छुट्टी पर जा रहे हो, 
 घर परिवार मोबाइल,इंटरनेट, टी.वी से दूर।
पर परेशान मत होना, फ़िराक़ ओर राहत जी की नज्में या पुरानी शौर्य गाथाये साथ बैठकर सुनते तो अच्छा होता।।

उन सभी माता पिता, जिन्होंने अपने बच्चो को "अभिनंदन" बनने की सलाह देदी, या फिर सेना में भर्ती को कह दिया उन को मेरा सलाम।
अगर येह मुठ्ठी भर साहस मेरे माँ बाप को भी दे आते तो अच्छा होता।।

ए.सी. कमरो में बैठकर सेना को, ये करना चाहिए, वो करना चाहिए ओर फिर तिरंगा हाथ मे लेकर चिल्लाने वालों, तिरंगे में लिपटें हुए जो आये हैं घर ज़रा उनसे मिल आते तो अच्छा होता।।

फौजियों की शहादत पर आंसू गिराए है आपने, मोमबत्तियां जलाई है, 
ट्रैन में अगर कोई फौजी मिले तो "जय हिन्द" बोलकर बैठने के लिए पूछ लेते तो अच्छा होता।।

परिंदो से, चिनार के पेड़ों से दोस्ती हो गयी है मेरी, 
आप अपने दोस्तों को भी ले आते तो अच्छा होता।।

अरे हान, 
असली बात भूल ही गया था,,
आप सब का वॉट्सएप्प, फेसबुक ट्विट्टर वाला जज़्बा ओर पराक्रम देखा मैन, मतलब मजा ही आजाता है, जोश भर देता है एकदम,
उसको अच्छे से समेटकर ले आते तो अच्छा होता।।

इंतजार कर रहा हूँ मैं, ओर मेरे जवान,
थोड़ा जल्दी आजाते तो अच्छा होता।।

शुभम गुप्ता
सहायक कमांडेंट
केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल

Thursday, 2 September 2021

वो कैसी औरते थी

वो कैसी औरतें थीं 

जो गीली लकड़ियों को फूंक कर चूल्हा जलाती थीं
जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं,

सुबह से शाम तक मसरूफ़, लेकिन मुस्कुराती थीं
भरी दोपहर में सर अपना ढक कर मिलने आती थीं,

जो पंखे हाथ से झलती थीं और बस पान खाती थीं
जो दरवाज़े पे रुक कर देर तक रस्में निभाती थीं
पलंगों पर नफासत से दरी चादर बिछाती थीं,

बसद इसरार महमानों को सिरहाने बिठाती थीं 
अगर गर्मी ज़्यादा हो तो रुहआफ्ज़ा पिलाती थीं,

जो अपनी बेटियों को स्वेटर बुनना सिखाती थीं 
जो "क़लमे" काढ़ कर लकड़ी के फ्रेमों में सजाती थीं,

दुआयें फूंक कर बच्चो को बिस्तर पर सुलाती थीं
अपनी जा-नमाज़ें मोड़ कर तकिया लगाती थीं,

कोई साईल जो दस्तक दे, उसे खाना खिलाती थीं
पड़ोसन मांग ले कुछ तो बा-ख़ुशी देती दिलाती थीं,

जो रिश्तों को बरतने के कई गुर सिखाती थीं
मुहल्ले में कोई मर जाए तो आँसू बहाती थीं, 

कोई बीमार पड़ जाए तो उसके पास जाती थीं 
कोई त्योहार पड़ जाए तो खूब मिलजुल कर मनाती थीं,

वह क्या दिन थे किसी भी दोस्त के हम घर जो जाते थे
तो उसकी माँ उसे जो देतीं वह हमको खिलाती थीं,

मुहल्ले में किसी के घर अगर शादी की महफ़िल हो
तो उसके घर के मेहमानों को अपने घर सुलाती थीं, 

वो कैसी औरतें थीं....... 

मैं जब गांव अपने जाता हूँ तो फुर्सत के ज़मानों में 
उन्हें ही ढूंढता फिरता हूं, गलियों और मकानों में,

मगर अपना ज़माना साथ लेकर खो गईं हैं वो 
किसी एक क़ब्र में सारी की सारी सो गईं हैं वो....