Saturday, 16 May 2020

ख़ाक जिंदा है हम



 मज़लूम की मौत-
मौत न रहकर-
बस नंबर भर रह जाए,

जब दूर कोई नेता- 
अपनी आरामगाह से-
निर्लज्ज आँकड़ों में उलझाकर-
अपनी जीत बघाये।

जब ज़िम्मेदार-
बदहाली पर-
मासूमियत दिखाए,

जब भूख से-बेकारी से-
घर जाने की लाचारी से,

सडक पर-
कोई बेवजह जान गवाए,

तब यकीन मानों-
मरा वो नहीं- मरे हैं हम।

मरे हैं हम,
बिन आत्मा के जिंदा है हम।।

No comments:

Post a Comment