मज़लूम की मौत-
मौत न रहकर-
बस नंबर भर रह जाए,
जब दूर कोई नेता-
अपनी आरामगाह से-
निर्लज्ज आँकड़ों में उलझाकर-
अपनी जीत बघाये।
जब ज़िम्मेदार-
बदहाली पर-
मासूमियत दिखाए,
जब भूख से-बेकारी से-
घर जाने की लाचारी से,
सडक पर-
कोई बेवजह जान गवाए,
तब यकीन मानों-
मरा वो नहीं- मरे हैं हम।
मरे हैं हम,
बिन आत्मा के जिंदा है हम।।
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