सीखना है तो जुगनू की तरह जलके अंधेरे से कैसे लड़ना है वो सिख,
इस दिखावटी रोशनी में वो बात नहीं।।
बहोत ना गुज़ार हो गया है मिज़ाज़ मौसम का आज कल,
लोगो को जलाने की आदत जो हो गयी है।।
लाखो दिये जलाकर भी भूल जाते है लोग उन्हें,
जिन्होंने महीनों से अपने हाथ छाले किये है दिए बनाने में।।
एक अजीब से बेचैनी है मौसम में,
शायद वो भी कह रहा है कि बस.. अब दम घुटता है।।
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