Ki: शराब की क्या औक़ात गिराए मुझे
हम खुद नशा सिर पर चढ़ाए रहते हैं..
Ka:हम ढूंढ रहे थे दारू में नशे को,
हमे क्या पता था कि जिन्दगी ही नशीली हो जाएगी।
Ki:
तुम दारू मे नशा
और नशे मे दवा ढूंढ़ते हो
दवा सुकून की
पर यकीन मानो सुकून इतना सस्ता नही
की युहीं मिल जाये।
Ka: दिल ए दौलत तो बेशुमार दी है खुदा ने,
सुकून क्या, जन्नत खरीद लेते,
वो तो बस बेखुदी की चादर जो ओढ़ रखी ह हमने।।
Ki :बेखुदी की चादर ज्यादा लंबी लगती है
सुकून और जन्नत खरीदने की बात कर रहे हो..
Ka:बातों में क्या रखा है, चाँद तारे भी टूट जाते हैं बातों में,
पर हान ऐतबार करना ए मेरे दोस्त,
चादर लंबी हो या छोटी,
लेकिन साफ है।।
Ki: मुसाफिरों की तरह बात कर रहे हो।
Ka: अब आदत हक चली है मुसाफ़िरी की,
खुद को समजने की समझाने की,
कुछ दाग़ लगे थे उसपर किसी वक़्त ए जमाने मे,
जमाना गुजर गया है साफ करते करते।।
Ki:
निरमा ओर घड़ी छोड़ो
इस बार चादर टाइड से साफ करो!!
Ka: का अभी भी टाइड से वो दाग साफ करने में लगा हैं।।
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