फिक्र उनको है बहुत आवाम की ,
मुल्क की , सरकार की , हुक्काम की,
बस्ती बस्ती घूमते हैं लाल झंडे ले के वो ,
वो नही परवाह करते हैं किसी अंजाम की ।
एक ही नारा है उनका , एक ही एलान है ,
बस वही काबिल हैं बाकी हर कोई बेईमान है ,
इतने काबिल हैं कि सारे मुल्क के मसलों का हल ,
वो बताते बैठ कर दूकान पर हज़्ज़ाम की ।
वो बताते हैं कि कैसे क्रांति आए देश में ,
माओ पर चर्चा करो , क्या है रखा स्पेस में ,
तोड़ दो सड़कें , उड़ा दो पुल कि तोड़ो हस्पताल ,
पाठशाला , बैंक ये चीज़ें हैं सब बेकाम की ।
क्या करोगे रोटियों का , क्या करोगे भात का ,
कुछ नही है मोल , घर परिवार और जज्बात का ,
क्रांति की खातिर वो कहते हैं कि सब कुछ छोड़ दो ,
जो भी सरकारी दिखे , हर चीज तुम वो तोड़ दो ,
सड़क , बिजली , काम धंधा इनकी चिंता मत करो ,
क्रांति की खातिर हैं ये कुर्बानियां बस नाम की ।
क्रांति लाओ क्रांति लाओ , खून से रंग दो ज़मीन ,
बच्चे बच्चे को बना दो मौत देने की मशीन ,
जंग लड़ने के लिए कुछ गांव वाले भेज दो ,
कॉमरेडों को जरूरत है जरा आराम की ।
लोग पागल हैं कि इतना भी समझ पाते नही ,
जंगलों में जंग लड़ने कॉमरेड आते नही ,
काम उनका है शहर में बैठ कर बस सोचना ,
न रखें उम्मीद उनसे और किसी भी काम की ।
खून की नदियां बहा दीं , सोच की तलवार से ,
क्यों न फिर मांगे वो सत्ता देश की अधिकार से ,
लाखों मजलूमों की लाशों पे बने इज़लास पर ,
गर न बैठा वो करोडों ख्वाहिशों की लाश पर ,
दूसरों की जंग लड़ते मर गया गर कॉमरेड ,
सुख न सत्ता का मिला , फिर क्रांति ये किस काम की ?
Sunday, 2 September 2018
क्रांति
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