ना जाने कब से सोच रहा हूं
किसे कहते हैं घर
चार दीवारें और एक छत
जिसे बनाया हो जतन से
सजाया हो जिसे पूरे मन से
तो बन जाता है क्या घर
जहां जाना, आराम हो
रुकना , सुकून
ठहर जाना , नींद के जैसा ।
फिर तुम्हें सोचता हु
तो लगता है
घर एक व्यक्ति भी हो सकता है,
उसकी महक, उसकी खुशबू ही उसका महत्व है,
उसकी आंखे भी मयखाना हो सकती है,
उसके दुलार से सींचा जा सकता है सारा बगीचा,
उसकी गोद से अच्छा बिस्तर ही कहां।
हर रोज हर समय जो याद आए वोही तो घर है मेरा,
जिसके बिन न आंखे, ना मन कहीं लग पाए,
वोही तो घर है मेरा।
पढ़ सकता हु दिनभर किसी पुरानी किताब की तरह,
कर सकता हु उससे मोहब्बत एक बेबाक आशिक की तरह,
बस वही मेरा घर है,
वही आशियाना,
वोही मेरा कर्म,
वोही ठिकाना।।
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